Shayari
ज़िंदगी से हारू मैं कब तक, तन्हा भटकू उनकी गलियों मे मैं कब तक,| क्या करूँ इन सवालो का थामे थमते नही, करूँ इंतेज़ार मौत का मैं कब तक|| वो थे जन्नत-ए-जहान आपना था, याद मे उनकी रोऊँ मैं कब तक| उमीदें थी, ख़याल थे, संग देखे सपने, टूटे इन खुवाबों को समेटू मैं कब तक|| गीली रातें है, बंजर दिन है, नयी बिलावली धुन से उदासीन रहूं मैं कब तक| इस आज़ार से तू राहत दिला दे, लूँ दावा तबस्सुम तेरे नाम की मैं कब तक||
Category: General Shayari        Posted On: 02-Jul-2010