ज़िंदगी से हारू मैं कब तक, तनà¥à¤¹à¤¾ à¤à¤Ÿà¤•ू उनकी गलियों मे मैं कब तक,|
कà¥à¤¯à¤¾ करूठइन सवालो का थामे थमते नही, करूठइंतेज़ार मौत का मैं कब तक||
वो थे जनà¥à¤¨à¤¤-à¤-जहान आपना था, याद मे उनकी रोऊठमैं कब तक|
उमीदें थी, ख़याल थे, संग देखे सपने, टूटे इन खà¥à¤µà¤¾à¤¬à¥‹à¤‚ को समेटू मैं कब तक||
गीली रातें है, बंजर दिन है, नयी बिलावली धà¥à¤¨ से उदासीन रहूं मैं कब तक|
इस आज़ार से तू राहत दिला दे, लूठदावा तबसà¥à¤¸à¥à¤® तेरे नाम की मैं कब तक||
Category: General Shayari
Posted On: 02-Jul-2010